(18 अप्रैल- विश्व विरासत दिवस के उपलक्ष्य में)
आओ, बचाएं अनमोल विरासत को

विश्वभर में धरोहरों की सूची पर गौर करें तो अब तक पूरी दुनिया में 981 स्थलों को विश्व विरासत स्थल घोषित किया जा चुका है जिसमें से 759 सांस्कृतिक, 193 प्राकृतिक और 29 अन्य मिले-जुले स्थल हैं। भारत को विश्व धरोहर सूची में 14 नवंबर, 1977 में स्थान मिला, तब से लेकर अब तक 28 धरोहरों को इस सूची में स्थान मिल चुका है जिसमें ताजमहल (आगरा, भारत) विश्व की सात प्रमुख धरोहरों में से एक है। वहीं नेपाल की 4 धरोहरों को विश्व धरोहर सूची में स्थान मिल पाया है जिसमें से भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी सबसे प्रमुख है।
किसी भी धरोहर को इस सूची में शामिल करने का पैमाना यूनेस्को ने तय कर रखा है। यूनेस्को द्वारा इस सूची में शामिल किए जाने वाले स्थलों का चुनाव विश्व विरासत स्थल समिति द्वारा किया जाता है। यह समिति तीन श्रेणियों (प्राकृतिक, सांस्कृतिक एवं मिश्रित धरोहर स्थल) में आने वाली संपत्तियों को षामिल करती है जो इन श्रेणियों के हिसाब से अत्यंत सुन्दर व वैज्ञानिक महत्व का होता है। यह समिति इन स्थलों की देखरेख यूनेस्कों के तत्वावधान में ही करती है और आवश्यकता पड़ने पर इसके संरक्षण हेतु आर्थिक सहायता भी प्रदान करती है।
यूनेस्कों के मुताबिक, विश्व विरासत सूचियों में से 44 धरोहर खतरे में है यानि की लुप्त होने के कगार पर है। इसके अलावा अलग-अलग देषों में उनकी अपनी राष्ट्रीय धरोहर है जो विश्व धरोहर सूची में शामिल तो नहीं है लेकिन उन राष्ट्रों के लिए काफी महत्वपूर्ण और सुन्दर धरोहर हैं। उसकी सुरक्षा व संरक्षण करना संबंधित राष्ट्र व जनता का ही कर्तव्य है। देखा जाए तो हमारी धरोहरों को कई वजहों से नुकसान पहुंचता रहता है उनमें से प्रमुख है आतंकी गतिविधियां व युद्ध, भूकंप एवं अन्य प्राकृतिक आपदाएं, प्रदूषण, अनाधिकार, अनियंत्रित शहरीकरण एवं पर्यटकों द्वारा धरोहरों को गंदा करना आदि। प्राकृतिक आपदा तो मानव के नियंत्रण में नहीं है लेकिन शेष अन्य सभी कारकों को नियंत्रित किया जा सकता है लेकिन आगे बढ़ने व जल्द से जल्द विकसित होने की होड़ ने विरासत क्या सभी पहलूओं को नजरअंदाज किया जाने लगा है। अनियंत्रित होती जा रही प्रदूषण खतरनाक रूप धारण करने लगी है। अत्यधिक उपभोग के कारण ही दुनियाभर में हजारों-हजार शहर प्रतिदिन लाखों-करोड़ों टन कचरा पैदा करते हैं जिसे आम तौर पर खुले में फेंक दिया जाता है। मीथेन गैस तो इन कचरे के ढ़ेरों से खूब निकलती है और इस गैस की क्षमता कार्बनडाईआॅक्साइड के मुकाबले 21 गुना ज्यादा खतरनाक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन करने की है। इनमें कटौती नहीं की गयी तो धरती के औसत तापमान में भविष्य में बड़ी भारी बढ़ोतरी होने की आशंका है। इन कचरों की वजह से ही विश्व की दस बड़ी नदियां सूखने/खतरे के कगार पर है चाहे भारत की गंगा हो या यूरोप की डेन्यूब या अन्य। यदि हालात नहीं सुधारे गए तो नदियों का अस्तित्व ही मिट जाएगा।
प्रदूषण की वजह से अम्लीय वर्षा धरोहरों को कमजोर करती है और दाग-धब्बों की छाप उस पर पड़ने लगती है। दूसरी ओर आतंकवादियों की नजरें भी इन विरासत स्थल पर टिकी होती है। उनका उद्देश्य आतंकी हमला कर संबंधित देश की विरासत को नष्टकर उसकी संस्कृति, पहचान, वजूद को समाप्त कर देने की रहती है। इसलिए बार-बार इन धरोहरों पर आतंकी हमला होता रहा है जैसे कि अमेरिका में वल्र्ड ट्रेड सेटर तो भारत में संसद, लालकिला, बौद्ध मंदिर एवं अन्य धरोहर पर, तो कुछ ऐसे ही हालात विश्व के लगभग सभी देशों में है। इसके अलावा पर्यटक भी विरासतों को नुकसान पहुंचाने में पीछे नहीं रहते। शरारती तत्व जैसे कुछ पर्यटक जहां-जहां भ्रमण करते हैं वहां-वहां अपने शरारती छाप छोड़ जाते हैं जैसे- अपने धरोहरों पर पान-गुटखा खाकर थूकना, ईंटों, कलम, स्याही अन्य चीजों से लिखना एवं अन्य गतिविधियां।
विरासतों को बचाने के लिए विश्व के विभिन्न देशों में अपने-अपने तरीके से सरकारी योजनाएं कार्यरत हैं। इसके अलावा स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका भी इस मामले में उल्लेखनीय है। ऐसे स्थलों के इर्द-गिर्द अधिक से अधिक से वृक्षारोपण हो, प्रदूषण को नियंत्रित किया जाए, पुरातत्व स्थलों पर गंदगी फैलाने वालों में जागरूकता फैलानी चाहिए ताकि वह ऐसा न करें। साथ ही अपने बच्चों को इतिहास के बारे में बताएं और किसी स्थल, किले, मकबरे या जगह पर ले जाकर वहां के बारे में रोचक तथ्य बताएं जिससे आने वाली पीढ़ी भी हमारी संस्कृति और इतिहास से परिचित हो सके और बच्चों को धरोहरों के बारे में जानने की जिज्ञासा बनी रहे और अपने धरोहरों को बचाने के प्रति सजग हो सके और अनमोल धरोहरों का विलुप्तीकरण रूक सके।
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